Monday, 1 July 2024

IPC, CrPC, Evidence Act की जगह लाए गये 3 नये कानून, अधिवक्ताओं के संगठनात्मक शक्ति/संघर्ष करने की क्षमता की विहीनता को दर्शाते हैं

कल से देश में लागू 3 नये कानून (जो IPC, CrPC, Evidence Act) की जगह लाए गये हैं, अधिवक्ताओं के संगठनात्मक शक्ति/संघर्ष करने की क्षमता की विहीनता को दर्शाते हैं। जिन अधिवक्ताओं ने देश को आजादी दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई तथा संविधान / नागरिक अधिकारों की रक्षा करना ही जिनका पेशा है वो आज खुद का ही अधिकार नहीं बचा पाए।

किसी भी देश का सबसे महत्वपूर्ण कानून होता है संविधान और फिर उसके बाद होते हैं क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (IPC, CrPC) के कानून। हमारे संविधान के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) उसमें भी सबसे महत्वपूर्ण हैं 19, 21, 22 और 25. और खास बात ये है कि ये जो क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के कानून होते हैं ये सीधे-सीधे मौलिक अधिकारों पर असर डालते हैं। मसलन अनुच्छेद 21 जीवन का मौलिक अधिकार और 41(A) CrPC. 41(A) CrPC बताता है कि किसी व्यक्ति को किस तरह और कब गिरफ्तार किया जा सकता है तथा उस समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए। यानि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के 3 कानूनों को संशोधित करना संविधान संशोधित करने जैसा ही है इससे देश के हरेक नागरिक के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

पर अफसोस की बात यह है कि इतने महत्वपूर्ण कानून हमारे संसद में कुछ घंटों की ही चर्चा और 140 सांसदों को निलंबित कर पारित कर दिया गया। जबकि इसके एक एक प्रावधान पर लंबी चर्चा होनी चाहिए थी। Congress ना सही कमसे कम BJP के सांसदों को तो अपना इनपुट देना चाहिए था। कोई नहीं तो भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश और मौजूदा राज्य सभा सांसद श्री रंजन गोगोई जो यही कहकर सांसद बने हैं कि वे न्यायपालिका से जूड़े मुद्दों पर संसद को अपना विशेष अनुभव और ज्ञान देंगे उनको तो एकाध धारा पर बोलना चाहिए था। पर ना तो वे संसद में हाजिर होते हैं और ना ही कोई प्रश्न पुछते हैं। 

इसके अलावा कई तकनीकी बातें भी हैं उदाहरण के तौर पर हो सकता है जो कानून का प्रावधान दिल्ली में आसानी से लागू हो जाए वो लद्दाख अथवा नागालैंड/केरल में मुनासिब ना हो। जो पुरुष पे लागू हो महिला, ट्रांसजेंडर अथवा दिव्यांगजन पर लागू ना हो सके। जैसे कि नये कानून में ट्रांसजेंडर पर्सन के विरुद्ध किये जाने वाले लैंगिक (सेक्सुअल) अपराध की कोई धारा नहीं है। मतलब किसी ट्रांसजेंडर पर्सन का रेप हो जाए तो भी यह कोई अपराध नहीं होगा। जबकि ऐसी कितनी घटनाएं उनके साथ रोजाना घटती हैं।

यह बात बिल्कुल सही है कि इन तीनों कानून (IPC, CrPC Evidence) में भारी बदलाव की आवश्यकता थी पर अफसोस तो इसी बात का है कि वो भी नहीं हुआ। पुराने कानून के लगभग प्रावधान हू ब हू कौपी पेस्ट मारा गया है बदलाव नाम मात्र का है। यानि अंग्रेजों का कानून हिंदी नामकरण के साथ बिल्कुल जारी है जैसे किसी गरीब व्यक्ति का नाम अमीर कुमार रख दिया गया हो और कह दिया गया हो आज से ग़रीबी खत्म। 

पर एक बात है बदलाव तो किया गया है कानून में और वो भी बहुत बड़ा जिसका भारी प्रभाव होगा वरना मुझे भी इस पोस्ट को लिखने की जरूरत नहीं होती। अबतक व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान आपके फोन में भी आने लगा होगा कि "302 हो जाएगा अब 103, 420 होगा 316 ......"। गुस्सा इसी बात का है जितने भी प्रावधान हैं उनका नंबरिंग पूरा बदल दिया है जबकि उसमें लिखी बातें ज्यों की त्यों रह गई। अब आज से सारे वकील, जज, पुलिसकर्मी, जेल प्रशासन, विश्वविद्यालय के छात्र और प्रोफेसर कल से बस एक ही काम करेंगे इन तीनों कानून की किताबों में unnecessarily अपना समय बर्बाद करेंगे। ठीक जैसे नोटबंदी में पूरा देश लाईन लगाकर नोट गिनता रहा और समय व्यर्थ किया पर काला धन आया नहीं। सच कहें तो CrPC में लिखी देश के नागरिकों की रक्षा करनेवाले प्रावधान तो वैसे भी लागू नहीं हो पा रहे थे अब ऊपर से ये नयी आफत? और एक बात कहनी पड़ेगी यहां पर कि नये कानून में कुछ बदलाव ऐसे जरूर हुए हैं जिससे पुलिस की शक्तियां और बढ़ गई हैं और नागरिकों की अब खैर नहीं जिसके कारण कई बुद्धिजीवी व सुप्रीम/हाई कोर्ट के अधिवक्ता नये कानून के बदलावों को ड्रैकोनियन (draconian) बता रहे हैं।

ये जो IPC, CrPC की पुरानी धाराएं थीं हम वकीलों व कोर्ट क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक भावना थी। कोर्ट के स्टाफ तो कानून की पढ़ाई करके भी नहीं आते सेवा में काम के दौरान प्रावधान सीख जाते हैं अब उनको हर रजिस्टर भरने से पहले जज से पूछना पड़ेगा। अब नये कानून फिल्म जगत को भी पढ़ना पड़ेगा। अब किसी भी सिनेमा का जज दफा 302 बा मशक्कत की सजा नहीं दे पाएगा‌। सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट के जितने भी फैसले हैं वो सब पूरानी धाराओं की संख्या के आधार पर ही हैं अब हम सभी वकील, जज और विद्यार्थी को 3 की जगह 6 कानून पढ़ने पड़ेंगे जीवन भर 3 पुराने और 3 नये। 

मैं एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि इन कानूनों को इस रूप में लाने का आइडिया किसी महामुर्ख इंसान ने दिया होगा सरकार को और पूरी प्रक्रिया में कोई भी जिला न्यायालय का अधिवक्ता या कोई भी अन्य अधिवक्ता भी नहीं बैठा होगा वरना कमसे कम नंबरिंग नहीं बदलने देता‌। एक‌ बात और मुझे टीस मार रही है नये कानून की एक धारा थी हिट एंड रन वाली जिसके खिलाफ ट्रांसपोर्ट संगठनों ने विरोध किया था जिसके फलस्वरूप वह प्रावधान लागू नहीं हुआ है, पर अधिवक्ताओं ने कुछ नहीं बोला, बार एसोसिएशनस ने कुछ नहीं बोला। ये अफसोस की बात है। इस देश के किसानों को लोग कृषि से जुड़े 3 कानूनों के फायदे सीखा रहे थे पर वे समझ गये थे और डटे रहे। ट्रांसपोर्ट संगठन भी‌ यही किये। ये दोनों कौमें तो वकालत की पढ़ाई भी नहीं की थीं। तो हम अधिवक्ता कानून का जानकार होने बावजूद भी क्यों चुप बैठे रहे? आज भी कहीं किसी बार एसोसिएशन या बार काउंसिल में कोई सुगबुगाहट तक नहीं है। जबकि अधिवक्ताओं की कौम देश की सबसे संगठित कौम है। खैर अब तो कानून लागू हो गये हैं असुविधा तो झेलनी ही पड़ेगी। फिर भी बोलना तो बनता है हमारा क्योंकि अब इस लोकतंत्र में हम भारत के लोग ही मिडिया हैं।

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